रत्न मढ़ित कुर्सियों को, फ़रेब से संभाले बैठे हैं ,
कुछ बुत आज ख़ुदा होने का वहम पाले बैठे हैं |
आवाम की खामोशी को, हल्के में मत लीजिये ,
ये लोग अपने अंदर भंयकर तुफान पाले बैठे हैं |
अपने पैनें हथियारों पर इतना भी मत इतराईये ,
शिवाजी की मानिद, हम भी खँज़र डाले बैठे हैं |
आपकी तरह हम आड़ लेके, हैं वार नहीं करते ,
सरेआम फौलादी सीना, लीजिये निकाले बैठे हैं |
आईये और दिखलाईये, अपनी बाज़ूओं का दम,
हम तो नेस्तानाबूद करने का जज़्वा पाले बैठे हैं ||
---- ---- ---- ---- ---- - मनोज मैहता
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