बार बार तो यूँ इश्क का, न इम्तहान लीजिये ,
ग़र लेनी ही है आपनें, तो मेरी जान लीजिये |
आपके वास्ते सिर, हथेली पर लिये फिरते हैं ,
हलाल करनें के बस, साज़ो सामान लीजिये |
घुट घुटकर यूँ भी तो वर्बाद ही है यह हो रही ,
हाथ में मेरी ज़िंदगी की, खुद कमान लीजिये |
आपकी ही तलब है और आपकी तड़प इसे ,
नोंच आप इस दिल के सारे अरमान लीजिये |
वापिस राह-ऐ- इश्क़ पर लौट तो मैं आऊँगा ,
आप दफा होनें का वापिस फ़रमान लीजिये ||
--- --- --- --- --- --- मनोज मैहता
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