Tuesday, 7 June 2016

उफ़ काश्मीर....!!

दूर तलक फैली हुई डल झील और चिनारों की मीठी हवा
बाग़े मुगल, शालीमार, निशाद, ज़न्नत है यह ज़मीं या ख़ुदा

गुलाबी लबों दुधिया चेहरों पर बिन मूँछ लहराती दाढ़ियां
सफेद कुर्तों पाजामों में क्या खूब फबें काश्मीरी बूढ़े जवां

काले चमचमाते लबादों पर लहरातीं वाह सफेद चुनरियां
बुर्कानशीं चेहरों से झाँकती महीन काली भवें व पुतलियां

हों सफीना, बेनज़ीर, सोफिया, या हों मुमताज़- शाजिया
अल्लाह की रहमत-ऐ मेहर से लगती हैं सभी शहज़ादियाँ

यह हुस्न इतना नूर, श्रीनगर, पहलगांव ,गुलमर्ग जी हुज़ूर
अलसाई सी मदमदाई भी मगर ख़ौफज़दा सी ये वादियाँ

चेहरों पर झूठी मुस्कानें पर पेचीदा कातिलाना हावभाव
इधर भी शक उधर भी संशय, ये कहाँ खत्म होंगी दूरियां

गफ़लतो याकि नफ़रतों की सब हदों को पार करती हुईं
चँद सियासती मक्कारियां तो कुछ मज़हबी मजबूरियाँ

ज़न्नत को दोज़ख बना दिया, क्यूँ अल्लाह को भुला दिया
बंदूकें- बारूदी सुरंगें नज़र करतीं, कब्रें और टूटी चूड़ियाँ

शिकारे, हॉऊस बोटें, याकि चोटियों पर खींचते हिंडोले
छोड़िये बादामी अखरोटी, तमाम तिज़ारती जी हुज़ूरियां

No comments:

Post a Comment

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...