सफ़र-ए-इश्क़ में न जाने क्या झमेले हो गये
लीजिये इक बार फिर से हम अकेले हो गये
ऐसा नँगा रक़्स किया वाद-ए-सबा ने देखिये
आदमी के मकाँ बिखरकर लो तबेले हो गये
यों भी कम ही फ़र्क है मर्द और घोड़ों में जी
हरी घास ज्यों दिखी दोनों झट नवेले हो गये
टी.वी चैनलों में आ गये जब से बाबा रामदेव
मीट मुर्गे से दुगने मंहगे लौकी- करेले हो गये
मान भी जाईये हुज़ूर तन पर न करिये ग़ुरूर
आप से अरबों पहले भी मिट्टी के ढेले हो गये
.. मनोज मैहता
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