Monday, 12 June 2017

घर नहीं है...!!

नाज़--नख़रे उठाने की उम्र नहीं है ,
तिरे हुस्न में भी अब वो असर नहीं है

तय ही तो था कि टूटेगा बे मेल रिश्ता ,
मेरी ओर से भी अब के कसर नहीं है

ख़्वाब--ख़्यालों में कब तक खोयें ,
यों कर तो ज़िंदगी होनी बसर नहीं है

बेजारी का चढता यह आजार हर दिन ,
कि ग़म--इश्क़ से बढ़के ज्वर नहीं है

पूछते फिर रहे हो क्यों पता- ठिकाना ,
मुझ कम्बख्त का कहीं भी घर नहीं है

 .....मनोज मेहता.....

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