नाज़-ओ-नख़रे उठाने की उम्र नहीं है ,
तिरे हुस्न में भी अब वो असर नहीं है ।
तय ही तो था कि टूटेगा बे मेल रिश्ता ,
मेरी ओर से भी अब के कसर नहीं है ।
ख़्वाब-ओ-ख़्यालों में कब तक खोयें ,
यों कर तो ज़िंदगी होनी बसर नहीं है ।
बेजारी का चढता यह आजार हर दिन ,
कि ग़म-ए-इश्क़ से बढ़के ज्वर नहीं है ।
पूछते फिर रहे हो क्यों पता- ठिकाना ,
मुझ कम्बख्त का कहीं भी घर नहीं है ।
.....मनोज मेहता.....
Great Bhai ji
ReplyDeleteNice shayari Bhai Ji ...keep growing
ReplyDeleteधन्यवाद विवेक
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