शख्सियत को आपकी कर तार तार जाती है
इक तरफा मुहब्बत जीते जी ही मार जाती है
छोड़ो भी शौक ये, नवाबों की मानिद जीने के
मुकद्दरों से तमन्नायें तो हर सू ही हार जाती हैं
जँग से कुंद ये खंजर चमचमाता भी था कभी
वक्त के कहर से यूँ ही हर शै की धार जाती है
कभी मौका निकाल कर, मिल तो लिया करो
बढ़ती ही नहीं तो ताल्लुकात में दरार जाती है
ये फ़ाकाकशी की मार है याकि सफर की ऊब
मंज़िल के पास जा कर घटती रफ़्तार जाती है
.. मनोज मैहता
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