छोटी सी बात देखिये बेवज़ह बड़ी कर डाली है
अपनी जिम्मेवारी आपनें बेहतर वैसे संभाली है
हक़ तो हमें भी है मिला कि करें तुम से ये गिला
नाहक़ ही क्यूँ हरीफ़ों की औकात बढ़ा डाली है
मरते हैं तेरे कहने पे कुछ उनके पास भी रहने दे
मौका-परस्तों नें कैसे आसपास भीड़ जुटा ली है
हम तो ठहरे तेरे ज़ाहिद बने रहेंगे हर सू कासिद
मगर न जाने क्यों तूनें ख़ुद हमसे दूरी बढ़ा ली है
चँद बिना कुछ किये हुये बैठे हैं ऊँची मीनारों पर
अपनी तो टूटी थाली है तो टूटी हुई ही प्याली है
.. मनोज मैहता
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