साज़िश की बू आती है उसके मन्नोवल और बुलावे में
देखना फिर से न आ जाना उस शातिर के बहकावे में
ये दिलकश मुस्कुराहट, ये मासूमियत या लड़खड़ाहट
भूल से भी मत फंसना उसके नुमायशनुमा दिखावे में
हमसे मिलना ज़रूरी ही है तो बड़े शौक से आ जाईये
हम होंगे या तो मय-खाने पर या मिलेंगे फिर ख़राबे में
कहना तो बहुत कुछ चाहा पर बात नहीं जी बन पाई
आवाज ही अपनी दब गई उस कातिल शोर शराबे में
अल्लाह तो ऐ काफ़िर तेरे दिल के भीतर ही बसता है
उसको कहाँ ढूँढता फिरता है जाकर काशी या काबे में
.. मनोज मैहता
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