मुकद्दरों के सहारे कितने दिनों तक चलते रहोगे यार
बेगाने माल पर क्या उम्र भर ही तुम पलते रहोगे यार
अपनी हस्ती पर यकीं करके हो जाओ ज़लबाफरोश
दूजे के जलबों से आखिर कब तक छलते रहोगे यार
इक बार तो सीना ठोंककर उनसे आँखें मिलाओ तुम
क्या ज़िंदगी भर ना मुराद दुश्मनों से टलते रहोगे यार
चुभती बातों को हँसी की फ़ज़ाओं में उड़ा दिया करो
इन्हीं आतिशी अल्फ़ाज़ों में नहीं तो जलते रहोगे यार
मौका जब सुनहरी मिल जाये तो भुना भी लिया करो
वक्त निकल जाने के बाद फिर हाथ मलते रहोगे यार
कभी तो इरादों अरमानों की कड़ाही में तेल डाल दो
थूक से ख्याली पकवान कब तलक तलते रहोगे यार
.. मनोज मैहता
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