रूको जी बस गिनेचुने दिनों का फेर है
गीदड़ का मुखिया ही होने वाला ढेर है
ईश्वर की लाठी की, आवाज़ नही होती
उसके घर में देर सही पर नहीं अंधेर है
बच्चों सी हरकतें व कायराना फितरतें
वह मेंडक नही महज़ 'कुएँ' की मुंडेर है
कुटिल सी मुस्कान 'ओ गधे' पहलवान
वाह! कैसा शिगूफा छोड़ा कि 'तू' शेर है
दौड़ता है यह सरपट बदल कर करवट
वक्त बतायेगा कि तू तीतर है या बटेर है
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