तालीम-ओ-दौलत के नशे में क्यों इतरा के अकड़ता है
जमीन की और झुकने से शख्सियत का भार बढ़ता है
कुदरत के कायदे को तू इन हरे दरख़्तों से ही सीख ले
कैसे झुक जाते हैं ये नीचे जब फूलों पर फल पड़ता है
आते हैं ग़र्दिश में भी सितारे बुलंदियों का ना ग़ुमाँ कर
सूरज को ही देख ले किस कदर डूबता और चढ़ता है
यह ओहदा ये पदवियाँ ये रंग-ओ-लिबास-ओ डिग्रियाँ
सब ही तो यहीं रह जाता है जब मुर्दा कब्र में गढ़ता है
क्या तीक्ष्ण नैन-ओ-नक्श हैं या कि मस्त उन्नत वक्ष हैं
असलियत में ये सारा चमड़ा है जो धीरे- धीरे सड़ता है
.. मनोज मैहता
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