विचारों के आवेग को कैसे भीतर रोक लूँ
लेखनी की स्याही यूँ ही क्यों कर सोख दूँ
गली का हो फालतू या कि घर का पालतू
कुत्ता बनना है मुझे जब भी चाहे भौंक लूँ
दुश्मन कुछ कहता रहे दिल पर बहता रहे
इतनी हिम्मत बख्शना हर बुरे को टोक दूँ
हरेक गलत सँदेश को वैर और विद्वेष को
फैलने से रोकने को संपूर्ण ताक़त झोंक दूँ
छोटी छोटी भ्राँतियाँ मिटा देती हैं क्राँतियाँ
ऐसी अफवाहों को खुद के दम पर रोक दूँ
साजिश चाहे गहरी हो सजग हर प्रहरी हो
देश पर मर मिटनें का पैदा तो कर शौक दूँ
मैं गर्व नही हूँ दँभ हूँ राष्ट्र का ठोस स्तंभ हूँ
हिंद की गाथा के मैं घड़ता नवीन श्लोक हूँ
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.. मनोज मैहता
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