Sunday, 13 March 2016

Have been deceived so much that...!!

फ़रेब इतनें खाये हैं कि तमाम भरोसे हिल गये,
हमारे ही घर के चंद लोग, दुश्मनों से मिल गये।

रोजी-रोटी का जुगाड़ याकि अपनेपन की आड़,
इसी तरह से सारे शहर का माल वो निगल गये।

हमारा गिरेबाँ नौचनें की, है बड़ी ही हसरत उन्हें,
बड़ी मशक्कत से हम, जिनके गिरेबाँ सिल गये।

इस गहरी साजिश का, खुलासा तो होनें दीजिये,
आप तो पहले ही, पिछले फाटक से निकल गये!

जज़्वात भी बँद मुट्ठी में रेत की मानिद हैं दोस्तो,
जितनें जोर से दबाये उतनें ही बाहर फिसल गये।।
--------------------- मनोज मैहता----------------------

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