Friday, 11 March 2016

What's wrong with climate ??

सूँ सूँ करदी ह़ोवा जे चल्ली, अम्बरें बद्दल़ छाई ग्या,
ल्ह़ेफ फिरी ते पै ओढणाँ, ह़टी बो स्याल़ा आई ग्या।

पह़ाड़े उप्पर जम्मीं चाँदी,कैत पाणीं खसमाँ खाँदी?
ह़ुण तां बर्फा टिकणां है़ई नीं, कजो स्यापे पाई ग्या?

कल छुड़ी सर्ट थी लाइयो,अज फिरी कोटी पाईयो,
घ़िरदा फिरदा गंदा मौसम,नक्कें स़ीह़्म चलाई ग्या।

शिवाँ परसूं झ़ोल़ी खोली, लग्गा जीजू पोणें बोल्ली,
देह़ा बृकटया मोआ मेघु, खड़पयाँ जो जरकाई ग्या।

इन्द्र देवतें नीं दिख्खणां, मेल़े दा ह़ी म्ह़ीना जिकणां,
बाज्झ़ी कृष्णें गोबर्धन बौणां,बुरा जमाना आई ग्या।।
------------------------ मनोज मैहता---------------------

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