किस बात के उलाहनें, कैसी शिकायतें ?
बदलनी नहीं जब तुमनें अपनी आदतें ।
हम मस्त हो गए कशमकश में अपनीं ,
भूले फिर करना मस्तियाँ और शरारतें ।
कुछ वक्त खुशी का तेरे सँग जो गुजरा,
देता रहेगा ताउम्र, अब हमें यह राहतें ।
जो कुछ हुआ सिर्फ इक खेल ही लगा,
ऐसी वैसे हो सकती नहीं सच्ची चाहतें ।
अाँख- कान मेरे अब काम के कहाँ रहे ?
न दिखे तेरी सूरत, न सुनाई देतीं आहटें ।
बड़ा खुश हैं मैं कि पेट भर केे मिल गया ,
नसीब में मेरे अब कहाँ वो शाही दावतें ।
---------------मनोज मैहता ----------------
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