संदेह या अविश्वास की चोट दे गया ,
कोई मेरी शराफ़त पर खोट दे गया ।
उससे कैसा ग़िला और कैसी खुन्नसें,
नामुराद झूठी यारी की ओट ले गया ।
यूँ बाहर से तो लगता हूँ ठीकठाक मैं ,
पर तेरा वार भीतर तक कचोट गया ।
एै हवा रुख मेरा जो तुफानी हो गया,
तो कहोगी तेरी हस्ती को समेट गया ।
पीठ पीछे खँजर अब चुभता नहीं मुझे,
सख्त ढाल कब से मैं पीछे लपेट गया ।
----------------मनोज मैहता ---------------
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