Sunday, 27 September 2015

Kangra and it's variations

काँगड़े पईयो गर्मी, मकलोड़गँज बरखा पोआ दी
औथु छुटन पसीनें मितरो कनें इथु ठँड बझ़ोआ दी

नगरोटा प्या उबल़ी उबल़ी, पालमपुर ह़ै ठँडा ठार   ,
उतराल़े दी मस्त ह़ोआ चोबीनाँ पुज्जी गरमोआ दी ।

कोसरी ता लम्मे ग्राँएँ तौंदिया माह़णूँ किंह़ियाँ जाएँ ,
कनें चँदपुर जाई नें दिख्खा, कोटी लाणाँ पोआ दी ।

भँगाल़ बड्डा-छोट्टा , बिलिंग, मुलथान ता लुहारड़ी ,
मिट्ठी-मिट्ठी ठँड्डी ठार ह़ोवा पूरे पिन्ड्डे च भ़रोआ दी।

मन्याँ कि शाह़पुर गरम ह़ै जा भ़ला बोह़ दरीणियाँ  ,
गाय़ी दी सौह़ रूह़ खुसिया ने नच्ची नच्ची पोआ दी ।

डमटाल़, नूरपुर, जसूर, जवाल़ी धमेटा या फतेह़पुर,
साह़की तुह़ाकी मैंनु तैनुँ , बोल्ली भ़ी बदलोआ दी ।

देहरा, गरली परागपुर ज्वालामुखी मझींण जसवाँ ,
सारे लाके लेयाँ हँड्डी, अपणीं ही जिमीं बझ़ोआ दी।

म्ह़ारी ताकत खुब्बदी बड़ी ताँह़ी स्कीमां घ़डी घ़डी, 
काँगड़े जो तोड़ने दी बड़ी साजश गह़री ह़ोआ दी !!

----------------------मनोज मैहता ---------------------

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...