Wednesday, 9 September 2015

Please speak something


                    ... बोलिए. ......
किबाड़ अपनें दिल के यार धीरे धीरे खोलिये
हाँ नहीं तो न ही सही मगर कुछ तो बोलिए

आपके ही इश्क़ में तो, फिरता हूँ मैं बेकरार
फेरकर अपनी निगाहें न हस्ती को झिंझोड़िए

देखा मुस्कुराकर उसे जैसे दिलनशीं हो बड़ा
हम भी तो ठीक ठीक हैं, कम न ऐसे तोलिये

राज़-ए-दिल हरेक मैंनें, आपसे साझा किया
अब यूँ खामोश रहकर, मन को न टटोलिये

कातिल निगाहें आपकी कर रहीं हैं मारकाट
हमें काट ही डालिये ,मुर्दा हैं कब के हो लिये

सित्तम भी तो आपके, नई अदा ही लगते हैं
और ज़ुल्म ढा दीजिए, इक बार हँस के बोलिए

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