कौन आख़िर इस दुर्दशा का असली जिम्मेदार है
नेताजी के साथ बेटे को भी लो पड़ने लगे हार हैं
अब प्रधान बनकर है अकड़ता फिर रहा शान से
पार्टी से ज्यादा जिसको अपने ओहदे से प्यार है
उसी को है अहमियत, मिलती उसे ही पदवियाँ
दल बदलनें के लिए, जो किसी भी पल तैयार है
वर्कर का तो फर्ज़ ही है, कसीदे पढ़ना शान में
मुखालफ़त जरा सी करे, कह दीजिए गद्दार है
कहाता यूँ तो बुनियाद या सतह की जढ़ भी है
पीठ पीछे मगर कहेंगे कि बेज़ा सिर पर भार है
विजयी रहे तो सारा श्रेय, काम अपनें को दिया
ठीकरा वर्कर के सिर पर,अगर मिली जो हार है
अफसरों से घिरकर कहाँ असल दिखेगा हुज़ूर
सच्च पता चल जायेगा, जब टूटनी सरकार है
बुरे वक्त में हम ही होंगे, आपके सर आसपास
अभी ख़ास जरूरत नहीं, चमचों की भरमार है
-------------------मनोज मैहता---------------------
No comments:
Post a Comment