Wednesday, 2 September 2015

Don't think a lot...

सोच्ची सोच्ची किछ नीं बणनाँ कम्म जे तैं किछ नीं करना
मनें मसोसी किह़िंयाँ जीणाँ, बाझ़ी मौत्ती किह़िंयाँ मरना?

उप्परे आल़े दिया मर्जिया गाँह़ ता तेरी मेरी पेश नीं चलणीं
फिरी कैह़दी चिंता ह़ै तिज्जो, जे़ड़ा बणना ठीक ह़ी बणना

लोक्काँ दी गप्पाँ नीं लगणाँ, खोप्पर ता तिज्जो भी दित्तया
गरीबाँ दी भी सुणाँ कर मोआ,अपणाँ ह़ी बस घ़र नीं भ़रना

प्रीत जे कुथकी लग्गी जाए, दिलडुएँ कोह़की बस्सी जाए
अन्दर अन्दर कितणां कुढनां, जमानें ते कितणा की डरना

कद्दी कद्दी मन उखड़ी जादाँ, रैह़ भौंएं कोह़की पतियाँदा
अपण मता किछ सोचणां पौंद्दा, इह़ियाँ भी बाबे नीं बणनाँ

ऐस्सियाँ गप्पाँ गलाई बैह़ँदा, काल़जुए बिच ह़ी आई रैह़ँदा
उह़ियाँ भी सरीफ ह़ै मैहता, इकदम मनें ते किह़िंयाँ कढणां

----------------------- मनोज मैहता ------------------------

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