चाहे आँखें तरेरिये या जोर से चीख लीजिए
इल्तज़ा है अपने प्यार की पर भीख दीजिए
जज़्वा-ए-इश्क़ आपनें जो मुझमें जगा दिया
पीछे नही अब हटूँगा मैं, यह सीख लीजिए
डसनें लगी तन्हाईयाँ जी छोड़िए रुसवाईयाँ
हर सूरत में तय मिलन की, तारीख़ कीजिए
फिरता हूँ मैं मारा मारा आपका ही है सहारा
आगोश में जरा कसकर, मुझे भींच लीजिए
आपकी हर अदा पर मर- मर के मैं जिया हूँ
झूठी ही सही इक मर्तबा तो तारीफ़ कीजिये
राज़ मैनें यार अपना, कोई तुमसे न छिपाया
छिपाकर मुझसे बातें, न यूँ तकलीफ दीजिए
खुशियों पर पूरा हक आपका ही है यकीनन
अपनें ग़म में तो मुझको भी शरीक कीजिये
नींद मेरी ख़ो गई है , करार भी तो हैं ग़ायब
क्या आप हैं मज़े में ? यह तस्दीक कीजिए ।।
------------------मनोज मैहता----------------
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