आज फिर दशहरे में रावण को जलते देखा ,
अपनें भीतर भी लेकिन उसको पलते देखा ।
राम बना जो शख्स मर्यादा की मूरत दिखा ,
पर्दे के पीछे ही उसे आँखें गरम करते देखा ।
हर चौराहे पर नज़र आए खरदूषण त्रिसरा ,
हरेक मोड़ पर माँ सीता को बिलखते देखा ।
घर घर में कैकेयी और मँथरा ने डेरा डाला ,
लखन को राम ही के विरोध में चलते देखा ।
भरत खड़ाऊँ की स्वर्ण कीलें हिलाता रहा ,
हनुमान को क्रोध की अग्नि में जलते देखा ।
बँद करिये अब बाँस-ओ बारूद को फूँकना ,
हर किसी को अपने अहम में जलते देखा ।।
---------------- - मनोज मैहता ------------------
No comments:
Post a Comment