संशय के पहाड़ पर चढ़ता रहा कोई ,
आँखों में मायूसियाँ पढ़ता रहा कोई ।
उसे खुश रखने के लाखों यत्न किये ,
ग़मों के नये किस्से, घड़ता रहा कोई ।
मँजिल के करीब ही राह भटक गया ,
उल्टी दिशा में ताउम्र बढ़ता रहा कोई ।
हालात मेरे ज्यूँ ज्यूँ, यारो सुधरने लगे ,
द्वेष के ताप में यूँही, सड़ता रहा कोई ।
वो बात और धुन का तो पूरा था धनी ,
तभी तो मुकद्दरों से, लड़ता रहा कोई ।।
............... मनोज मैहता...............
No comments:
Post a Comment