चुभती नहीं अब मुझे, ये तेरी खामोशियाँ ,
और भी काम हैं कुछ और हैं सरगोशियाँ ।
माना इश्क़ का सुरूर रग-रग में छाया था ,
रूखेपन से पर तेरे, टूटी हैं ये मदहोशियाँ ।
बँधा रहा आँचल से,ताज़वानी शख्स जो ,
क्यूँ करे ढली उम्र में, वो जिस्मफ़रोशियाँ ।
चेहरा अपना आईने में, देख ले तू गौर से ,
नज़र तुम्हें भी आयेंगे चँद तो दागो निशाँ ।
किरदार तेरे ने ही, विवश कहने को किया ,
शायद अब न आयें, रिश्तों में गर्मजोशियाँ ।।
--------------- मनोज मैहता -----------------
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