चापलूसों से घिरा है, ये उसको बतलाये कौन
हम उसके हमदर्द हैं, आखिर ये समझाये कौन
मंज़िल से भटक गया, साज़िशों में अटक गया
जब निकलना ही न चाहे, तो राह पे लाये कौन
उस अनजु की ख़ातिर भिड़ जाता तूफ़ानों से भी
पर शक की बीमारी से, यारों बाहर लाये कौन
परख नहीं अपनों की, होली जलेगी सपनों की
दिल में लगी आग को, कहो अब बुझाये कौन
मन में है जो बात, ज़ाहिर कर दे आज की रात
अब सच ही कह दे कि तुझको भड़काये कौन
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