Saturday, 10 January 2026

ऐ बाबर

ओ  बाबर ,  सुनो हक़ीक़त-ए-हस्ती इस दास्तानी की
बस   इक  बार  क़सम  तो   खाओ  तुम  भवानी की

जो आये थे यहाँ पर आतिश-ओ-ख़ंजर  लिये दिल में
यहीं   मदफ़न   हुई   तहरीर   उनकी   नादानी    की

न   तख़्तों  ने  अमाँ  दी , न  क़िलों ने हाथ ही  थामा
शहादत   दे  रही  है  ख़ाक    उनकी   हुक्मरानी  की

लहू  से   सींची    मिट्टी    कभी    वीरान  क्या  होगी
अजब   तासीर   होती   है    शहीदों  की  कुर्बानी की

क़लम जब हर्फ़े-सच लिख दे तो सर  झुकते हैं सबके
यही  पहचान  ठहरी   है    सदा   सच्ची  कहानी  की

नफ़रत  का  सफ़र  दो  रोज़ में थक  कर बिखरता है
मगर  सदियाँ  गुज़र  जाती   हैं  इक मीरा दीवानी की 

मनोज  कह  रहा  है  आज   तारीख़   के  हवाले  से
न  मिट  पायेगी  पहचान   अब   हर  हिंदुस्तानी  की

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