Wednesday, 14 January 2026

खंगाली हैं


गुज़श्ता  दौर  के    ढेरों   से   खंगाली  हैं
तमाम  यादें   मैंने   ज़ेहन  में  संभाली  हैं

अंदाज़ अपने पर यूँ तो मुझे नाज़ बहुत है
पर  उसकी  अदाएँ  आज  भी  निराली हैं

ऐ  चारागर   बता,   तू  इसे    कैसे  भरेगा
नामुराद  दिल की  तो सब  खाने ख़ाली हैं

दस्तख़तों  को   बार-बार  देखते  क्यों  हो
ये  चैक  और  चैकधारी दोनों ही जाली हैं

चंद  यारों  ने जो  पीठ   में  पूरी  उतार दीं
मैंने  वो  सब  छुरियां  ख़ुद ही  निकाली हैं

हमने  सीखा  है सलीक़ा  ज़ख़्म सहने का
वरना  तक़दीर की चालें तंग करने वाली हैं

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