गुज़श्ता दौर के ढेरों से खंगाली हैं
तमाम यादें मैंने ज़ेहन में संभाली हैं
अंदाज़ अपने पर यूँ तो मुझे नाज़ बहुत है
पर उसकी अदाएँ आज भी निराली हैं
ऐ चारागर बता, तू इसे कैसे भरेगा
नामुराद दिल की तो सब खाने ख़ाली हैं
दस्तख़तों को बार-बार देखते क्यों हो
ये चैक और चैकधारी दोनों ही जाली हैं
चंद यारों ने जो पीठ में पूरी उतार दीं
मैंने वो सब छुरियां ख़ुद ही निकाली हैं
हमने सीखा है सलीक़ा ज़ख़्म सहने का
वरना तक़दीर की चालें तंग करने वाली हैं
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