प्रिय श्रोताओं—
आज मैं आपसे एक ऐसा प्रश्न साझा करना चाहता हूँ,
जो हर विवाह में गूंजता है,
हर गीत में झलकता है,
और हर दिल को छू जाता है—
“सात जन्मों का साथ ही क्यों?”
साथियो,
यह केवल एक परंपरागत वाक्य नहीं है,
यह किसी पंडित की रटी-रटाई पंक्ति नहीं है,
यह हमारी सभ्यता की आत्मा की आवाज़ है।
जब अग्नि के सामने
वर और वधू सात फेरे लेते हैं,
तो वे केवल इस जन्म का वादा नहीं करते—
वे कहते हैं—
अगर जन्म फिर मिला,
अगर देह बदली,
अगर समय दोहराया गया,
तो भी—
तुम ही मेरा साथ रहोगे।
साथियो,
सनातन परंपरा में सात कोई साधारण संख्या नहीं है।
सात लोक हैं,
सात ऋषि हैं,
सात स्वर हैं,
सात चक्र हैं—
और इन्हीं सात से जीवन पूर्ण होता है।
तो जब हम कहते हैं
“सात जन्मों का साथ,”
तो हम कहते हैं—
पूर्णता तक का साथ।
यह रिश्ता केवल
सुख में साथ चलने का नाम नहीं,
यह तो दुःख में थामे रहने की प्रतिज्ञा है।
यह रिश्ता केवल
युवावस्था की मुस्कान नहीं,
यह बुढ़ापे की कंपकंपाती उँगलियों को थामने का नाम है।
यह रिश्ता केवल
आज का नहीं—
यह कल, परसों और आने वाले हर समय का विश्वास है।
साथियो,
हमारी संस्कृति कहती है—
कुछ ऋण ऐसे होते हैं
जो एक जन्म में पूरे नहीं होते।
माता–पिता का ऋण,
गुरु का ऋण,
और पति–पत्नी का ऋण—
ये आत्मा तक लिखे जाते हैं।
इसीलिए कहा गया—
यह साथ सात जन्मों का है।
और याद रखिए,
सात जन्मों का साथ
कहना आसान है,
निभाना कठिन।
यह वाक्य तभी सार्थक है
जब अहंकार झुके,
जब संवाद बचे,
जब विश्वास टूटे नहीं।
यदि हर दिन
एक दूसरे को चुनने का साहस हो,
तो एक ही जन्म
सात जन्मों के बराबर हो जाता है।
और यदि सम्मान न हो,
तो सात जन्म भी
एक पल में बिखर जाते हैं।
अंत में मैं बस इतना कहना चाहता हूँ—
सात जन्मों का साथ
कोई गिनती नहीं,
यह एक संकल्प है—
कि
“मैं तुम्हारे साथ रहूँगा
हर रूप में,
हर हाल में,
हर जन्म में।”
धन्यवाद।
🙏
मनोज मैहता
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