अपनी अपनी दौड़ है
लूटने की होड़ है
लहरा दिया है ध्वज
जनता पर है असहज
अधिकारों पर तो जोर है
कर्तव्य लेख हैं महज़
कहने को लोकतंत्र है
लोग पर परतंत्र हैं
ये ऊँची ऊँची कुर्सियां
सब लूटने के यंत्र हैं
सचिवों की प्रधानता
कहां है जी समानता?
जलसों में भीड़ जुट रही
ज़रूरत है लुट रही
दिखावे को देशभक्त हैं
यूँ सत्ता पर आसक्त हैं
मन में हरा या भगवा है
तिरंगे का दिखावा है
जय हिंद का शंखनाद
हमी से छलावा है
मौसम ! गमगीन नीरस है
जी हाँ आज गणतंत्र दिवस है
No comments:
Post a Comment