Monday, 26 January 2026

मैं मुर्दा हूं


मैं पुराने बस अड्डे के निचले हिस्से में आज भी पड़ी हूँ—
एक सड़े-गले शरीर की तरह।
अभागी इसलिए नहीं कि टूट गई,
बल्कि इसलिए कि मेरे अंतिम संस्कार के लिए
आज तक कोई सामने नहीं आया।
महज़ एक इमारत ही सही,
लेकिन कभी मैं भी नवयौवना थी—
मदमस्त, भरोसेमंद, ज़रूरी।
लाखों राहगीरों ने मुझे सराय की तरह इस्तेमाल किया।
भयानक काली रातों में
मैंने न जाने कितनों को पनाह दी,
सिर्फ़ छत ही नहीं—
चैन की नींद दी।
सुबह वे लोग
तरोताज़ा होकर उठते,
अपने अगले सफ़र के लिए
आत्मविश्वास बटोरते
और मुझे धन्यवाद कहे बिना ही सही,
मगर तसल्ली के साथ विदा होते।
मैं तब भी खामोश थी,
पर ज़िंदा थी।
फिर वक़्त ने करवट बदली।
नगरोटा बगवां की लिदबड़ वीरान होने लगी,
और मेरे यहाँ रुकने वालों की तादाद
तेज़ी से घटती चली गई।
मैं खाली नहीं हुई थी—
बस नज़र से उतरने लगी थी।
कुछ समय बाद
मुझे पुलिस चौकी में बदल दिया गया।
मेरी दीवारों ने सख़्ती ओढ़ ली,
कमरों में चारपाइयों की जगह
मेज़-कुर्सियाँ आ गईं।
रातें तब भी जागती थीं,
लेकिन अब
थकान नहीं,
शिकायतें दर्ज होती थीं।
गरीबों की बेबसी,
औरतों का डर,
नौजवानों की गलतियाँ—
सब कुछ
मेरी ईंटों में समा गया।
फिर एक दिन
पुलिस भी चली गई।
नई इमारतें बन चुकी थीं—
चमकदार, शीशे वाली,
जिन्हें लोग “विकास” कहते थे।
और मैं?
मैं फ़ाइलों से भी बाहर कर दी गई।
अब मेरे शरीर के
टुकड़े-टुकड़े हो चुके हैं।
अस्थि-पिंजर बिखरे पड़े हैं।
कमरे मलबे में तब्दील हो गए हैं।
छतें आसमान नहीं रोक पातीं,
और बारिश
सीधे मेरे ज़ख़्मों पर गिरती है।
दीवारों पर उगी काई
मेरी उम्र नहीं,
मेरी उपेक्षा बताती है।
और सबसे बड़ा अपमान—
मैं प्रशासन की अनुमति के बग़ैर
पेशाबघर में बदल दी गई हूँ।
कोई तख़्ती नहीं,
कोई चेतावनी नहीं,
कोई शर्म नहीं।
जो कभी सराय थी,
आज अपमान का ठिकाना है।
लोग आते हैं,
अपना बोझ हल्का करते हैं,
और ऐसे लौट जाते हैं
जैसे मैं कभी इंसानों के काम ही न आई होऊँ।
मैं चीख नहीं सकती,
इसलिए बदबू बनकर
पूरे कस्बे में फैल जाती हूँ।
मैं विरोध नहीं कर सकती,
इसलिए मेरी सड़न
सवाल बन जाती है।
और अब सच यह है—
मेरे मालिक सिर्फ़ ज़मीन चाहते हैं।
उन्हें मेरी दीवारों से कोई मतलब नहीं,
मेरी यादों से कोई सरोकार नहीं।
ईंटें उन्हें रेट में चाहिए,
छतें मलबे में।
मैं अगर खड़ी हूँ
तो अड़चन हूँ।
मैं अगर टूटी हूँ
तो अवसर हूँ।
वे कहते हैं—
“इमारत जर्जर है।”
कोई यह नहीं कहता
कि उसे जर्जर बनाया गया।
जिस दिन दाम तय हो जाएगा,
उसी दिन मेरा अस्तित्व
पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया जाएगा।
मेरे गिरने की आवाज़
किसी को सुनाई नहीं देगी—
क्योंकि
मेरे मालिकों को
इतिहास नहीं,
सिर्फ़ ज़मीन चाहिए।
और जो समाज
अपनी इमारतों को इस तरह मरने देता है,
वह एक दिन
अपनी स्मृतियों को भी
इसी तरह
पेशाबघर में बदल देता है।

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