Sunday, 11 January 2026

इश्क़ की मद में, यार, मेरी बुद्धि बस नादान रही

इश्क़ की मद में, यार, मेरी  बुद्धि बस नादान रही
अगर मैं बूढ़ा हो गया तो  तू भी  कहाँ जवान रही

वक़्त ने हम दोनों से ही छीन ली  सरगम धीमे से 
मैं तो  अजनबी हुआ ही  तेरी  भी न पहचान रही

हमने  चाहा  उम्र  थमे,  ख़्वाब  ज़रा  ठहर  जाएँ
पर  मुक़द्दर  के आगे  हर  दुआ ही बे-ज़बान रही

तेरे  चेहरे  पर जो रौनक थी, बे मौसम  की  तरह
दो  घड़ी  के लिए ही बस बनकर वो मेहमान रही

किसी आईने ने सच कह दिया, तो बुरा क्या मानें
ज़िंदगी  उम्र  भर  अपने  ही  सच से परेशान रही

तजुर्बों  ने  छीन  ली आँखों  से शरारत की चमक
इश्क़ तो था मगर अब उस आतिश में न जान रही

मनोज अब गिला किससे करें, ये दस्तूर-ए-जहाँ है
हर  मुसाफिर  की  यहां बस ऐसी ही दास्तान रही

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