जोगिंदरनगर से सिद्धार्थ और अर्चित के साथ नगरोटा वापिस लौट रहा था कि घट्टा के पास पहुँचते-पहुँचते यकायक मन में विचार आया—टीहरू जी से मिलता चलूँ। वे बैजनाथ में ही होंगे। फोन मिलाया तो बोले,
“महाकाल में हूँ, वहीं आ जाइए।”
सिद्धार्थ का मन नहीं था, पर मेरी खातिर उसे जाना ही पड़ा।
गणेश बाज़ार पहुँचते ही मन जैसे वर्तमान से कट गया। आँखों के आगे पुरानी स्मृतियाँ लहराने लगीं। ननिहाल जाते समय कैसे पपरोला स्टेशन पर रेलगाड़ी से उतरकर सरोज भैया के पीछे-पीछे दीदी और मैं चला करते थे। बिनवा का पुल पैदल पार कर, आगे कुआली चढ़ते हुए गणेश बाज़ार पहुँचते।
तीनों भाई-बहन पैदल ही महाकाल की ओर लुढ़कते जाते थे।
दीदी रोती—
“अटैची उठाओ सरोज भैया।”
पर भैया कहाँ मानते। दीदी रुआँसी हो जाती, फिर वही अटैची सिर पर रख चल पड़ती।
मैं ठहरा छोटा—मुझे तो दीदी वैसे भी कोई काम नहीं करने देती थी। सारा बोझ मानो उसी की नियति बन गया था।
तकियां फाटक के पास पहुँचते-पहुँचते अँधेरा उतर आता। नानी के शब्द कानों में गूँजने लगते—
“घम्बो आ जाएगा… घम्बो ले जाएगा।”
तकियां उस्तेहड़ और शीतला माता का फासला जैसे कभी ख़त्म ही नहीं होता था। एक-एक कदम पहाड़ बन जाता। बैजनाथ और पाणसुआ तक तब घम्बो का नाम फैला हुआ था।
आज वह डर नहीं रहा, पर उस डर में भी जो अपनापन था—वह अब नहीं मिलता।
कुंसल पहुँचते ही झटिया और नोईं जी की धुँधली-सी छवियाँ आँखों के सामने तैरने लगतीं।
जो भी “झटिया” पुकार देता, वे ग़ुस्से से डराने लगते।
और नोईं जी—घघरू पहने, हर समय वैसी ही छवि, जैसे समय ने उन्हें कभी छुआ ही नहीं हो।
मन स्मृतियों से नशीला होता चला गया।
पाधा जी, पधैणी जी, नाग हलवाई, रमेश जी—बां के पास वाले।
चाचू-चाची के घर से बहुत पीछे जाकर बहती हुई वह बड़ी-सी कूहल।
गंगड़ भत्त की खुशबू।
बैहिया का मेला।
महाकाल के पुल के नीचे की आल।
नाथ जी, वर्मा जी, रमेश जी, धुलारिया जी, प्रकाशी, संतोष—
नाम नहीं, चेहरे नहीं—पूरा एक जीवन आँखों के आगे कौंध गया।
मगर पलक झपकते ही सब विलुप्त।
अब कोई पहचानता नहीं।
वे लोग यहाँ नहीं रहे। जिन नामों से रास्ते जाने जाते थे, जिन चेहरों से जगह जीवित रहती थी—सब स्मृति बन चुके हैं।
आधुनिकता और तरक्की ने चुपचाप उस संस्कृति और उस गाँव को निगल लिया है।
रास्ते चौड़े हो गए हैं, पर अपनापन संकरा पड़ गया है।
मकान पक्के हैं, पर रिश्तों की नींव ढह चुकी है।
भीड़ है, पर पहचान नहीं।
सचमुच—वह शांत-सा पाणसुआ, वह महाकाल कहीं खो गया लगता है।
कभी-कभी तो लगता है,
शायद यह सब कुछ था ही नहीं—
बस स्मृतियों का कोई भ्रम था,
जो मन के किसी कोने में आज भी साँस ले रहा है।
तभी सिद्धार्थ की आवाज़ आई—
“चाचू, महाकाल से किस तरफ़ चलना है?”
मैं चुप रहा।
क्योंकि जो रास्ता पूछ रहा था,
वह अब नक़्शों में था—
मेरे भीतर कहीं नहीं।
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