Friday, 9 January 2026

मैं सनकी हूँ


नज़दीक  आकर दूर तुम फिर जा नहीं सकते
मैं  पूरा  सनकी हूँ  इसलिए ठुकरा नहीं सकते

मेरे  मिज़ाज  में  लहरें   हैं   तेज़  तूफ़ानों  की
तुम  कश्तियाँ  हो,  मुझसे  टकरा  नहीं सकते

ज़ख़्मों  को  बड़े  शौक़  से   रखता  हूँ सीने में,
तुम  मरहमों  से  मुझको  बहला   नहीं  सकते

मैं  अपनी  आग  खुद हूँ, अपना धुआँ भी खुद
तुम  फूँकों  से  मुझको जला-बुझा  नहीं सकते

मेरी  ख़ामोशी  को   कमजोरी  न   समझ बैठो
मैं  समंदर हूँ कि  तुम मेरी थाह  पा नहीं सकते

जब  टूटता  हूँ   तब और भी   नुकीला  होता हूँ
मरमरी  हाथों  से  तुम   मुझे सहला नहीं सकते 

तुम   सौ  मुखौटे   बदलो    बाज़ार-ए-इश्क़   मे,
असली  चेहरा  मगर  मुझसे  छिपा  नहीं सकते

मेरे   इन  ही   सवालों  में   फाँसी  का  फंदा  है
तुम चुप  रहकर भी  खुद  को  बचा  नहीं सकते

मैं  हर  रिश्ते  को आख़िरी सच तक ले जाता हूँ
आधे  सफ़र  का  साथ  तुम   निभा  नहीं सकते

जिसको   इश्क़   कहते   हो  वो  सौदा  है सिर्फ़
तुम   इसमें  मेरी   क़ीमत    लगा   नहीं   सकते

मैं  ज़हर  हूँ,  मगर   खरा   हूँ   अपने  असर  में
चाशनी  घोलकर भी  तुम मुझे  चबा नहीं सकते

उतरना  है  तो  उतरो  मेरी  रूह  की  गहराई में
यूं  ही किनारे खड़े हो के कुछ भी पा नहीं सकते 

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