Friday, 30 January 2026

मामू

वो जब बोलता है तो मानो इतिहास की परतें खुलती चली जाती हैं,
शब्द नहीं — तप, अनुभव और युगों की यात्राएँ बोलती हैं।
उसकी वाणी में धूल भरे ग्रंथों की गंध है,
और भीतर जलती हुई दीर्घ साधना की लौ।
वो जब बोलता है तो अध्यात्म की शीतल हवा
चहुँओर बहने लगती है,
मन की व्याकुल झील पर
कोई अदृश्य करुणा हाथ फेर जाती है।
वो जब बोलता है तब मन करता है —
क्षण ठहर जाए, समय भी शिष्य बनकर बैठ जाए,
और मैं निस्पंद, निःशब्द, बस सुनता रहूँ।
तिरसठ बसंतों की थकान शरीर पर दिखती है,
कदमों में अब पहले-सी तीव्रता नहीं,
पर मन — अभी भी युवा पर्वत सा अडिग,
बुद्धि — अब भी दीप्त,
हृदय — अभी भी दीपदान।
वो पूर्ण नहीं —
सांसारिक धूल उसके वस्त्रों पर भी है,
मानवीय कमजोरियाँ उसके द्वार भी दस्तक देती हैं,
पर उसके गुण, उसका चिंतन,
उसकी दृष्टि की गहराई — अतुलनीय है।
वो बोलता है तो नानक की करुणा साथ चलती है,
कबीर की निर्भीकता मुस्कुराती है,
तुलसी का समर्पण झुक जाता है,
कालिदास की प्रकृति आँख खोलती है।
रूमी का इश्क़ घूमता है,
बुल्ले शाह की पुकार सुनाई देती है,
ख़्वाजा की दरियादिली,
निज़ामुद्दीन की महक,
शम्स तबरेज़ की अग्नि —
सब उस स्वर में तैरते प्रतीत होते हैं।
बुद्ध की शांति,
सुकरात के प्रश्न,
प्लेटो के स्वप्न,
अरस्तू का तर्क,
शंकर का अद्वैत,
रामानुज की भक्ति —
सब जैसे उसके वाक्यों में आसन जमाते हैं।
नचिकेता का जिज्ञासु साहस,
दधीचि का त्याग,
गुरु अर्जुनदेव का धैर्य,
मीरा की तन्मयता —
क्षण भर को उसके आसपास मंडराते हैं।
वो जब बोलता है —
देह की सीमाएँ पीछे छूट जाती हैं,
विचार आकाश में खुल जाते हैं,
और सुनने वाला
अपने ही भीतर की यात्रा पर निकल पड़ता है।
ऐसे लोग देह से भले क्षीण हो जाएँ,
पर चेतना से — युगों तक अडिग रहते हैं।
देवेन्द्र जम्वाल — तुम्हें प्रणाम।
तुम्हें लोग मामू कहते हैं, और यह नाम केवल संबोधन नहीं,
अपनत्व का एक जीवित प्रतीक है।
परदे का “मामू” बाद में मशहूर हुआ,
डीएवी कॉलेज कांगड़ा के अस्सी के दशक का असली मामू
तो तुम पहले से थे।
तुम हँसी में दर्शन रखते हो,
सरलता में गहराई,
और अपनापन ऐसे बाँटते हो
जैसे यह तुम्हारी जन्मजात पूँजी हो।
तुम रिश्तों की सीमाओं में बँधते नहीं —
मित्र भी हो, मार्गदर्शक भी,
शिक्षक भी, सहयात्री भी,
और कई बार
निर्भीक सच कहने वाले भी।
तुम्हारी उपस्थिति से महफ़िल हल्की हो जाती है,
तुम्हारी बातों से विचार ऊँचे हो जाते हैं,
और तुम्हारी मुस्कान से
अजनबी भी अपना लगने लगता है।
तुम्हें सलाम —
तुम्हारी सादगी को,
तुम्हारी सोच को,
तुम्हारी जीवंत दार्शनिकता को।
सब रिश्तों से ऊपर लगते हो तुम —
दिल से निकला एक ही वाक्य पर्याप्त है —
सलाम मामू… प्रेम और आदर सहित।

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