Saturday, 10 January 2026

दरख्तों के तनों


दरख़्तों के  तनों पर अब वो छाल  अच्छी  नहीं  लगती,
मुझे    उसकी   लचकती   चाल   अच्छी  नहीं  लगती।

वो  वक़्ते-सादा-दिली  था,  झट  मुआफ़ी माँग लेता था,
अब  सर  झुकाने   की  हर  ढाल  अच्छी  नहीं  लगती।

के-एफ-सी,  पीज़ा  के  इस  होम-डिलीवरी  के दौर  में,
मुझे  घर  में  पकी   सादी   दाल   अच्छी  नहीं  लगती।

जब   एतबार  का  सारा   निज़ाम  सिमटा  है  मॉलों में,
मुझे  फिर कोई  ‘मस्त’ हड़ताल  अच्छी   नहीं  लगती ।

दे   दो   इक  स्मार्ट  सा मोबाइल  आज़ादी  के बुत को,
उसे  हाथों   में  पकड़ी   मशाल   अच्छी   नहीं  लगती।

जो कल तक देख कर मुझको बहुत आराम मिलता था,
वो   अपनी  बेबसी  में   बदहाल   अच्छी  नहीं  लगती।

मनोज,  आईने  से  अब  मुलाक़ातें  भी  कम  कर  लीं,
मुझे अपनी  ही कोई भी मिसाल   अच्छी  नहीं  लगती।

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