Saturday, 10 January 2026

मर गया हूँ मैं


तेरी  आँखों  की  झील  में उतर गया हूँ मैं
डूब  ही  जाने  दे  अब चूँकि मर गया हूँ मैं

लहू   छलक‑छलक  के मुँह  हुआ  है लाल
तुझे  क्यूँ  लग  रहा है कि  संवर  गया हूँ मैं

उम्र  ने  दिखावटी   यूँ ही ला दी है शराफ़त
हर्गिज़ ना यारों, ज़रा  भी  सुधर  गया  हूँ मैं

मैंने  सच  बोल दिया तो बहुतों को बुरा लगा
इस  झूठे  शहर  में इसलिए   ढल गया हूँ मैं

मेरे ज़ख़्मों पे नमक छिड़कते हैं मुस्कुरा कर
अब  बता  किसलिए  ऐसे निखर  गया हूँ मैं

मक़ाम  पूछते  हैं  लोग  मेरी   ख़ामोशी  का
भार  में दब के भी  कितना बिखर गया हूँ मैं

मनोज़, आईना  क्या  दिखाएगा  ज़माने को
ख़ुद  को  पढ़ते‑पढ़ते बन  पत्थर  गया हूँ मैं

No comments:

Post a Comment

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...