जड़ा-मड़ा बोल्ला दा मितरा
तू बड़ा गँद घ़ोल़ा दा मितरा
मैहता तां ह़ै म्या बड्डा ध़ड़छ
तू चिमचा बोल्ला दा मितरा
एस पी ह़ोराँ जे भ़ँग समटेरी
झ़ूड़याँ तू फरोला दा मितरा
नशे टूट्टदेयां जिस्म जे तप्पया
पख्खिया मैं झोल्ला दा मितरा
ह़ुण जरा म्या माह़ंणु बणीं जा
जग रिकार्डे खरोला दा मितरा
Thursday, 1 September 2016
हा हा हाहाहा हा हा...!!
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भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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🌺 भृगु-वंश महाकाव्य गान 🌺 नारी-पक्ष बुआ इंदू आज के दिन यूँ फिरती इतराती, ज्यों कोकिला उछल-उछल कूकू करती जाती। बंदना, ऋतु, सीमा, नीतू की दे...
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--- ग़ज़ल चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त। किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया, मगर न थमी ...
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