Friday, 9 September 2016

जाग उठे हैं हम

जाकर अब लो छिप गया शिमला के गलियारों में
जिसका नाम है सबसे ऊपर काँगड़ा के गद्दारों में
हित हमारे जिन्होने बेचे  अपनी कुर्सी की ख़ातिर
है इसका भी कुनबा शामिल उन्ह चंद परिवारों में
उसकी लाश को  कुत्ते भी  मुँह तक नहीं लगायेंगे
जिसनें माँ  की इज्ज़त बेची  सरे आम बाजारों में
गाय के बच्चे जाग उठे हैं  तू  चुपके से दुबका रह
ख़ून  के झौंके बह रहे हैं, अब उनकी ललकारों में
साज़िशें और मुँहफट बोल  बनेंगे तेरे गले में ढोल
ताँडव का संगीत तू सुन ले  हवाओं और ब्यारों में
नया वक्त है  नया दौर,  उगने ही वाली है नई भौर
ताज़ा कोंपलें हैं उग आईं त्रिगर्त के चील दयारो में
मेरी धरती का इक दीपक  सूरज सा है चमक रहा
उसने खलबली ला दी है काले स्याह अंधियारों में
ऐ 'बाली' नाम के कारीगर, उठा छैनियाँ और सँदर
चंद पत्थर नये लगाने हैं,  इन ढहती हुई दीवारों में

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