जाकर अब लो छिप गया शिमला के गलियारों में
जिसका नाम है सबसे ऊपर काँगड़ा के गद्दारों में
हित हमारे जिन्होने बेचे अपनी कुर्सी की ख़ातिर
है इसका भी कुनबा शामिल उन्ह चंद परिवारों में
उसकी लाश को कुत्ते भी मुँह तक नहीं लगायेंगे
जिसनें माँ की इज्ज़त बेची सरे आम बाजारों में
गाय के बच्चे जाग उठे हैं तू चुपके से दुबका रह
ख़ून के झौंके बह रहे हैं, अब उनकी ललकारों में
साज़िशें और मुँहफट बोल बनेंगे तेरे गले में ढोल
ताँडव का संगीत तू सुन ले हवाओं और ब्यारों में
नया वक्त है नया दौर, उगने ही वाली है नई भौर
ताज़ा कोंपलें हैं उग आईं त्रिगर्त के चील दयारो में
मेरी धरती का इक दीपक सूरज सा है चमक रहा
उसने खलबली ला दी है काले स्याह अंधियारों में
ऐ 'बाली' नाम के कारीगर, उठा छैनियाँ और सँदर
चंद पत्थर नये लगाने हैं, इन ढहती हुई दीवारों में
Friday, 9 September 2016
जाग उठे हैं हम
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भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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