इकट्ठी जो भाँग और शराब हो गई
उनकी बुद्धि लो फिर खराब हो गई
उनकी बेहूदगी व गीदड़ भभकियाँ
मानों हमारी बात का जवाब हो गई
हमारी ज़िंदगी कलंक का ज्यूं धब्बा
और ख़ुद की खुली किताब हो गई
कैसे बहकायेगा काफ़िर तू दुनिया को
तेरे दुश्मन की वो तो शादाब हो गई
बहुत पागल है यार मैहता तू भी तो
तेरे कारण उसकी नींदें खराब हो गईं
Tuesday, 6 September 2016
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भेड़िए मर्द का देखना ...
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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