Monday, 26 September 2016

मैं....!!

नहीं किसी सलोने बुत सा बिक गया हूँ मैं
मील के पत्थर की मानिद टिक गया हूँ मैं

जिनको नहीं परवाह, उनकी बात छोड़िये
है जिन्हें मेरी ज़रूरत उन्हें दिख गया हूँ मैं

मुसीबत में साथ देना ही मेरी है ख़ासियत
न समझिये कि साथ ही चिपक गया हूँ मैं

मेरी शख़्सियत को यूँ हल्के में  न लीजिये
ख़तरनाक हूँ जब कभी  बिदक गया हूँ मैं

कलम में कौमों को  बदलने की है ताक़त
उसी कलम से जाने  क्या लिख गया हूँ मैं
                                   .. मनोज मैहता

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