Monday, 12 September 2016

ईद मुबारक हो

अल्लाह का हरेक हुक़्म हर दीद मुबारक हो
सब ख़ुदा के बंदों को बकर- ईद मुबारक हो
उसकी रज़ा से बियावाँ में ज़िदगी पनपनी थी
इम्तिहां इब्राहिम का सब उसकी ही करनी थी
हजर और इस्माईल को जब रेत पर छोड़ा था
भारी मन से इब्राहिम तब पच्छम को दौड़ा था
उसके तिलस्म से सब ही कुछ जब नष्ट हुआ
भूखप्यास से बेटा बिलखे माँ को भारी कष्ट हुआ
अलसफ़ा अलमरवाह पर मारी मारी फिरती थी
बेटे के जीवन की ख़ातिर उठ उठ के गिरती थी
फरिश्ता ज़िबरैल तब मक्का में आ बिराजा था
उसका आना अल्लाह की मर्ज़ी का तकाज़ा था
अपने हाथ के प्रहारों से वो पत्थरों पर टूट पड़ा
मीठे पानी का तब कुआँ-ए-ज़मज़म फूट पड़ा
इब्राहिम, हजर, इस्माईल की सच्ची कहानी है
शैतान को ग़र भूल जायें तब तो यह बेमानी है
जब जब भी शैतान नें इब्राहिम को बहकाया है
साफ़ पाक इब्राहिम से पत्थर ही तब खाया है
अल्लाह के आदेश से बेटे पे हथियार उठाया था
बेटा तो जीवित रहा, कटा हुआ मेमना पाया था
उसी अल्लाह के रसूल से क़ाबा फिर बनाया था
और तब ही इस्माईल नें नुबुव्वाही को पाया था
इंसानियत का पाठ है ये आओ तुम सब पढ़ लो
इस मुबारक मौके पे, हँस हँस के सज़दा कर लो

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