Wednesday, 22 May 2024

बहुत जल्दी हमारे शहर से  उकता रहा है वो
जबरन आपको तब ही  उधर बुला रहा है वो, 
 
मुर्ग मुसल्लम डकार कर यूँ न बने रहो मुरीद
तुम्हारी नस्लों को गुलाम बस बना रहा है वो,

आलीशान होटल, फैक्ट्रियां, बंगले-ओ-मॉल
सबकुछ तुम्हारी ही बदौलत कमा रहा है वो,

बैठे रहो सभी बनेर-धरूँ-ओ-पौड के किनारे
हम सब को बस इसी ओर निपटा रहा है वो, 

जो जितना बड़ा है  उतना ही जूठा ज्यादा है 
चूंकि उस चमचे से ही हरकुछ खा रहा है वो, 

असली चेहरा आप कभी भी न देख पाओगे 
हर रोज नया मुखौटा क्योंकि लगा रहा है वो। 


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