वैसे ही वक़्त भी मेरी निशानी पे आ गया।
हँसने की एक उम्र थी, रोने का एक दौर,
हर इम्तिहाँ मेरी ही जवानी पे आ गया।
जिसको सँभालते रहे उम्र भर हथेलियों में,
वो आईना भी आज शैतानी पे आ गया।
मंज़िल तो मिल गई, लेकिन ये क्या हुआ,
साया सा मेरे दिल की वीरानी पे आ गया।
उम्मीद की चादर थी बड़ी देर तक सलामत,
पहला ही वार वक़्त का नादानी पे आ गया।