Thursday, 16 July 2026

नादानी पे आ गया

रिस-रिस के जैसे दर्द कहानी पे आ गया,
वैसे ही वक़्त भी मेरी निशानी पे आ गया।

हँसने की एक उम्र थी, रोने का एक दौर,
हर इम्तिहाँ मेरी ही जवानी पे आ गया।

जिसको सँभालते रहे उम्र भर हथेलियों में,
वो आईना भी आज शैतानी पे आ गया।

मंज़िल तो मिल गई, लेकिन ये क्या हुआ,
साया सा मेरे दिल की वीरानी पे आ गया।

उम्मीद की चादर थी बड़ी देर तक सलामत,
पहला ही वार वक़्त का नादानी पे आ गया।

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नादानी पे आ गया

रिस-रिस के जैसे दर्द कहानी पे आ गया, वैसे ही वक़्त भी मेरी निशानी पे आ गया। हँसने की एक उम्र थी, रोने का एक दौर, हर इम्तिहाँ मेरी ही जवानी प...