बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये
हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो नहीं हरगिज़
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये
इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगनित दौर देखे हैं
मुझ पे अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये
ये कायदे कानून दुनिया के हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेकती उन ताक़तों से पूछिये
कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ फुटपाथों पर नँगे सो रहे
मदमस्त अध-नंगों की महफिलों या दावतों से पूछिये
..मनोज मैहता
ज़बरदस्त 👌
ReplyDeleteधन्यवाद हुज़ूर
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