अपने राग अपने रंग
अजब तेरे है सारे ढंग
देखकर और भालकर
हम तो रह गए हैं दंग
पल में तौला पल में माशा
हर घड़ी अलग ही भाषा
अब सब्र के बांध टूटे
बह गई है सारी आशा
अगर हो मुझसे तंग
छोड़कर यह मूक जंग
कह दो याकि लिख दो
उठती नहीं वह तरंग
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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