गुजश्ता दौर के ढेर में से खंगाली हैं
तमाम यादें मैंने ज़हन में संभाली हैं
अंदाज़ अपने पर यूँ तो नाज़ है मुझे
पर उसकी अदाएं बड़ी ही निराली हैं
ऐ चारागर बता तू कैसे भर देगा इसे
नामुराद दिल के चारों खानें खाली हैं
दस्तख़तों को बार बार देखते क्यूँ हो
ये चैक व चैकधारी दोनों ही जाली हैं
चंद यारों ने धोखे से भोंकी जो पीठ में
मैंने वो सब छुरियां खुद ही निकाली हैं
No comments:
Post a Comment