Tuesday, 26 September 2023

गुजश्ता दौर

गुजश्ता दौर के  ढेर में से  खंगाली हैं
तमाम यादें  मैंने ज़हन में  संभाली हैं

अंदाज़ अपने पर  यूँ तो नाज़ है मुझे 
पर उसकी अदाएं बड़ी ही निराली हैं

ऐ चारागर  बता तू कैसे भर देगा इसे
नामुराद दिल के चारों खानें खाली हैं

दस्तख़तों को  बार बार देखते क्यूँ हो
ये चैक व चैकधारी दोनों ही जाली हैं

चंद यारों ने धोखे से भोंकी जो पीठ में
मैंने वो सब छुरियां खुद ही निकाली हैं

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