डूब ही जाने दे अब चूँकि मर गया हूँ मैं
लहू छलक छलक के मु़ंह हुआ है लाल
तुझे क्यूँ लग रहा है कि संवर गया हूँ मैं
उम्र ने दिखावटी यूँही ला दी है शराफत
हर्गिज़ ना यारों जरा भी सुधर गया हूँ मैं
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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