धुन निकलती नहीं ख़ुद-ब-ख़ुद साज़ से,
गज़ल भी बनती नहीं सिर्फ अल्फाज़ से।
थोड़ी कंपन या लर्जिश तो पैदा कीजिये,
कहाँ जमेगी महफिल खुष्क आवाज़ से!
चेहरे में जरा सी कशिश भी है लाज़िमीं,
नहीं बनेंगी बात, यारो महज़ अँदाज़ से।
इश्क की राहों से जो न हो कभी गुज़रा,
मिलाइये कभी हमें भी, ऐसे जाँबाज़ से!
इस फलस्फे़ का अँत, मातम ही से होगा,
तय यह तो हो गया था इसके आगाज़ से।।
----------------- मनोज मैहता ---------------
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